राधा कैसे न जले- 14 (अंतिम)
हमेशा की तरह देव के कानों में कोई बाबरी धुन बज रही थी... देव लिखने में तल्लीन था... देव का हुलिया बिल्कुल बदल चुका था... आंखों पर बिना फ्रेम का मंहगा चश्मा था... नंबर कोई माइनस दो होगा... दूर की चीजें बिना चश्मे के धुंधली सी दिखती थीं... पिछले दस सालों...
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देवेश वशिष्ठ ' खबरी '
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[11 Mar 2010 03:26 AM]



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