मैं और तन्हाई - भाग १
इक रात थी काली अंधियारीजीने की चाह से मैं हारीन खुला था आगे कोई पथलगा, थम गया है जीवन-रथन पास में था मेरे कोईमैं बिलख-बिलख कर बस रोईइक साथ में थे आंसु और गमनैना रहते थे हर दम नमफ़िर एक घडी ऐसी आईआंखें भी मेरी पथराईमैं गम थी या गम ही मैं थाकोई भेद न था ,...
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सीमा सचदेव
मैं और तन्हाई
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[11 Mar 2010 03:10 AM]



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