निकानोर पार्रा की एक और कविता - पहले सबकुछ भला दीखता था
पहले सबकुछ भला दीखता थाअब सब बुरा लगता हैछोटी घंटी वाला पुराना टेलीफोनआविष्कार की कुतूहल भरी खुशियां देने कोकाफी होता थाएक आराम कुर्सी - कोई भी चीजइतवार की सुबहों मेंमैं जाता था पारसी बाजारऔर लौटता था एक दीवार घड़ी के साथ-या कह लें कि घड़ी के बक्से के साथ...
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चन्दन
कविता
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[11 Mar 2010 02:36 AM]



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