अब नीलकंठ बनना नहीं!
अरे सरस्वती के पुत्रो/पुत्रियोमत रचो ऐसा किसरस्वती का अपमान हो.रचना वह नहींजो सिर्फ प्रशस्ति होरचना वो हैजिसमें समाई समष्टि हो.अनर्गल,निर्थक,निरुद्देश्य,इस कलम को उठाना उपासना नहीं,उसका अपमान है.जैसे वाणीचाहे मधुर बोले या उगले गरलसबकी अपनी...
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रेखा श्रीवास्तव
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[11 Mar 2010 02:10 AM]



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