थोडा सा स्त्री होना चाहता हूं - रणेन्द्र
कौन जाने उसके बिरहोड. टंडा मेंबसंत आता था या नहीं,अकाल-मृत्यु आ ही जाती अक्सरकई-कई रूप धर कररणेन्द्र की कविताओं से गुजरना जैसे दुखमय जीवन की स्मृतियों से गुजरना है। दुख जो हमें सालता है बारहा, चालता है हमारे भविष्यत के स्वप्नों तक को। हतवाक् करती हैं ये...
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[10 Mar 2010 21:46 PM]



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