"जीवन राग"
जीवन राग की तान मस्तानीसमझे न ये मन अभिमानी ;बंधता नित नव बन्धन मेंकरता क्रंदन फिर मन ही मन में ;गिरता संभलता चोट खाताबावरा मन चलता ही जाता ;जिस्म से ये रूह के तारकर देते जब मन को लाचार ;होता तब इच्छाओं का अर्पणमन पर ज्यूँ यथार्थ का पदार्पण ;छंट जाता...
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सुमन'मीत'
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[01 Feb 2010 15:03 PM]



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