"जीवन राग"

बावरा मन जीवन राग की तान मस्तानीसमझे न ये मन अभिमानी ;बंधता नित नव बन्धन मेंकरता क्रंदन फिर मन ही मन में ;गिरता संभलता चोट खाताबावरा मन चलता ही जाता ;जिस्म से ये रूह के तारकर देते जब मन को लाचार ;होता तब इच्छाओं का अर्पणमन पर ज्यूँ यथार्थ का पदार्पण ;छंट जाता... [पूरी पोस्ट]
writer सुमन'मीत'
views
6
upvote
0
downvote
0
rating
0
comments
0
[01 Feb 2010 15:03 PM]

Free Vedic Astrology From Astrobix