अँधियारा सवेरा
उजली चादर ओढ़ेनिकला नया सवेरा ;पर अधखुली इन आँखों सेछटा नहीं था अभी अँधेरा ;थोड़ी सी थी नमीछाया था अभी कोहरा !ये सुबह बीत करदोपहर में बदल गई ;हज़ार कोशिशे नाकाम रहीअँधेरा लिपटा था मुझसे अभी ;दिन भी बीत गया ऐसेइसी कशमकश में शाम गई !रात ने आकर अबचान्दनी की आस...
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सुमन'मीत'
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[03 Feb 2010 12:06 PM]



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