"प्रकृति के रंग"
शाम ढल आईमेघ की गहराईनीर बन आईआसमा की तन्हाईन किसे भी नज़र आई ;रातभर ऐसे बरसे मेघसींचा हर कोना व खेतन जाना कोई ये भेदकिसने खेला है ये खेल ;प्रभात में खिला उजला रूपधुंध से निकली किरणों मे धूपखेत में महका बसंत भरपूरअम्बर आसमानी दिखा मगरूर ;पंछियों से उड़े...
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सुमन'मीत'
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[07 Feb 2010 04:00 AM]



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