ढलती शाम

बावरा मन ढलती शामअकसर देखा करती हूँशाम ढलते-2 पंछियों का झुंड सिमट आता है एक नपे तुले क्षितिज में उड़ते हैं जो दिनभर खुले आसमां में अपनी अलबेली उड़ान पर.... शाम की इस बेला में साथी का सानिध्यपंखों की चंचलताउनकी स्वर लहरी प्रतीत होती एक पर्व सीउनके चुहलपन से बनती... [पूरी पोस्ट]
writer सुमन'मीत'

ढलती शाम

views
21
upvote
0
downvote
0
rating
0
comments
9
[10 Mar 2010 09:29 AM]

Free Vedic Astrology From Astrobix