एक कविता, एक ग़ज़ल और चित्र ...

काव्य मंजूषा रुख को कभी फूल कहा आँखों को कवँल कह देते हैंजब जब भी दीदार किया हम यूँ ही ग़ज़ल कह देते हैंवो परवाना लगता है कभी और कभी दीवाना साजल कर जब भी ख़ाक हुआ शमा की चुहल कह देते हैंवो आके खड़े हो जाते हैं जब सादगी लिए उन आँखों मेंवो पाक़ मुजस्सिम लगते हैं हम ताजमहल... [पूरी पोस्ट]
writer 'अदा'
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[10 Mar 2010 18:22 PM]

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