उठो कि आसमान की बुलंदियों पर अपना नाम लिखना है!
अज़ीज़ बर्नीकभी-कभी लिखते समय मैं इस बात का ख़याल नहीं रखता कि मेरा लेख साहित्यिक या पत्रकारिता के मूल्यों का किस हद तक पाबंद रहा है। भाषा व बयान के ऐतबार से भी यह कोई ऐसी तहरीर नहीं होती जिसे उल्लेखनीय कहा जा सके। बेश्तर ख़ामियाँ हो सकती हैं, इसलिए कि हर...
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Aziz Burney
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[10 Mar 2010 11:37 AM]



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