आदमी

घुरूवा आज खुशामदखोर अहं के गरल उगलते हैंकरते हैं बाहर से सौदा भीतर बिकते हैंरिश्ते नाते हुए खोखले मुंह देखा व्यवहारउल्लू सीधा करने वालों की है आज कतारपल-पल डींग हॉंकते अपना यश दुहराते हैंचमचे स्वारथ के रस पीने शीश झुकाते हैंकिन्तु असंभव है खोटे सिक्कों का चल... [पूरी पोस्ट]
writer संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari

विद्या भूषण मिश्र

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[31 Dec 2009 23:00 PM]

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