दुरूह जीवन संध्या के पल !

यथार्थ वे स्टेशन की सीढ़ियों पर किनारे से बैठे थे और मैं स्टेशन पर ट्रेन का इन्तजार कर रही थी। पता नहीं क्यों मेरी आँखें उनके चेहरे को पढने लगीं -- बार - बार छलक रहे आंसुओं को पोंछते जा रहे थे और आंसू भी बार बार आ रहे थे। मन में एक जिज्ञासा सी हुई कि क्यों इस... [पूरी पोस्ट]
writer रेखा श्रीवास्तव
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[11 Feb 2010 03:29 AM]

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