यक़ीं कीजे, ये मैं ही हूँ, जरा फोटो पुरानी है

पाल ले इक रोग नादां जिंदगी के वास्ते... छुट्टियाँ कब बीत जाती हैं, पता भी नहीं चलता। ड्युटी पर आये हुये ये चौथा दिन और फिर से वही अहसास कि जैसे यहीं हूँ सदियों से। सतरह सालों बाद इस बार उपस्थित हो पाया था होली पर अपने गाँव में और क्या खूब होली जमी। अबके इधर कश्मीर में खूब-खूब बर्फ गिरी... [पूरी पोस्ट]
writer गौतम राजरिशी

कुमार विनोद

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[09 Mar 2010 20:30 PM]

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