गीत कलश से छलकी तीन सौ पचासवीं बूँड--आपके सामने
जिसे देख कर के अजन्ता बनी थीमचलती हुई इस हवा के इरादमेरे हमनशीं जो अगर नेक होतेनहीं छेड़ती फिर ये ज़ुल्फ़ें तुम्हारीन अठखेलियाँ चूनरी से ही करतीये सोई हुई थी कहीं झाड़ियों मेंकिसी फूल की पंखुरी ्में सिमट कजगा कर गया एक खुशबू का झोंकातुम्हारे पगों से चला...
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राकेश खंडेलवाल
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[09 Mar 2010 21:15 PM]



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