अजनबी

युग क्रांति अनजानी डगर पर मिला था "अजनबी"दिल तोड़ गया आज शाम को शिकयत करें भी अगर हम उसकी जुबान पर लायें किस नाम कोशर्म कहाँ बची हैं "दिल्ली वाले" मेंचांदनी चौक में बेच कर आ गया मुर्ख प्राणी भटकता भावुकता लिए अन्धकार में"अजनबी" सीने पर गरम लोहा चिपका गया हाय हाय करता... [पूरी पोस्ट]
writer यशवन्त मेहता "फ़कीरा"

मेरे भीतर का शायर

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[09 Mar 2010 15:38 PM]

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