एहसास खोए जब
लिखने बैठे हैं कुछ आजबहुत दिनों बादसोचते थेरब्त-ए-ख्यालों के जहाँ सेआवाज़ देंगे एहसासों कोकोई गीत, ग़ज़ल, कविता, नज़्म या रुबाईदौड़ी चली आयगी...हमारे दामन में आ बेनक़ाब हो जाएगी।लेकिन ये क्या ?दिल-ए-गोशा में कोई जज़्बात ही नही ,एक सुनहरी तीरगी और बाआवाज़...
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Priya
डायरी से
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[09 Mar 2010 14:30 PM]



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