बनते मकान में........लगा है उसके ही सपनों का गारा
बिखरे पड़े हैं टूटे पत्थरों मेंकहीं उसके सपने जो टूटे थे पत्थरों के साथबिना आवाज किये धूल बनके उड़ गए एक-एक करके सारे सपने अब बदली सी छायी हैआँखों में उसके, इन बनते मकान में....दीवारों में चुनते जा रहे हैं कुछ भारी कुछ हलके...
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Tej Pratap Singh
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[09 Mar 2010 14:02 PM]



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