मन तरसे इक आंगन को
-- मनोज कुमार हुआ असह्य अब एकाकीयांत्रिक जीवन, आपाधापी !मिले जो कुछ मनभावन को,मन तरसे इक आंगन को ! ओसारे पर की बैठक,बहुओं की चुहलबाजियां !ननदों की शरारतेंदेवरों की मस्तियां !! सासों के ताने,ससुर का खांसना !बधुओं का घुंघट से,शर्माकर झांकना !! देना इशारे...
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करण समस्तीपुरी
काव्य-प्रसून; मनोज कुमार
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[09 Mar 2010 08:00 AM]



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