कचोट

zakhm बरसों साथ रहकर भीतेरा मेरा अनजाना रिश्तादेह की दहलीज पर हीक्यूँ सिमट गयामन के आँगन तक की राहकोई मुश्किल तो ना थीमौन का शून्य हीअस्तित्व को बाँटता रहाप्रगाढ़ स्नेह के बंधन कोकम आँकता रहाअर्धांगिनी शब्द कोखूँटी पर टाँकता रहाअर्ध अंग के महत्त्वको नकारता... [पूरी पोस्ट]
writer वन्दना
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[09 Mar 2010 00:27 AM]

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