शब्द हैं अजनबी
शब्द हैं अजनबी शब्द आते नहीं होंठ पर अब मेरे, भावना सो गई शाल इक ओढ़ कर कंठ में स्वर अटकते हुए रह गये, आये बाहर नहीं मौन को तोड़ कर कुछ कहा न गया, कुछ लिखा न गया, वाणी चुप हो रही, शब्द हो अजनबी और वह इक कलम जिसको अपना कहा, वो भी चल दी मेरे हाथ को छोड़ कर...
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राकेश खंडेलवाल
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[08 Mar 2010 21:04 PM]



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