क़हर

उधेड़-बुन पहले भी बरसा था क़हरअस्त-व्यस्त था सारा शहरआज फ़िर बरसा है क़हरअस्त-व्यस्त है सारा शहरबदला किसी से लेने सेसज़ा किसी को देने सेमतलब नहीं निकलेगापत्थर नहीं पिघलेगाजब तक है इधर और उधरमेरा ज़हर तेरा ज़हरबुरा है कौन, भला है कौनसच की राह पर चला है कौनमुक़म्मल नहीं है... [पूरी पोस्ट]
writer Rahul Upadhyaya

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[08 Mar 2010 21:12 PM]

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