अंतर्मन
चीखूं, चिल्लाऊं या ख़ामोश रहूं सब एक सा है,निर्दोष न रह पाऊंगा...इस रणभूमि में ।हार और जीत स्वरूप बदल सकते हैं,दामन भी.परन्तु आदि, अन्त और कारक न बदलेगा वही अहम, क्रोध, पश्चाताप मिश्रित ।धर्म अधर्म कौन तौले सारथी कहां ?फिर दुर्योधन की सेना भी नहींसभी...
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Satya Prakash Bajpai
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[19 Feb 2010 13:23 PM]



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