चोट से बने जख्म से कहीं मुश्किल है बातों से बने जख्म की पीड़ा को बर्दाश्त करना
दोस्तों माफ कीजिएगा.....मैं कोई लेख नहीं लिख रहा हूं, ये महंगाई के मुद्दे पर प्रज्ञा जी की सोंच पर मेरे भाव हैं। कमेंट के लिए शब्द सीमा तय है..इसलिए मुझे लेख के जरिए अपना कमेंट पोस्ट करना पड़ रहा है।प्रज्ञा जी...महंगाई को लेकर आपकी सकारात्मक सोच की...
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Sitanshu
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[22 Feb 2010 13:42 PM]



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