बनते मकान...बन गए हैं श्रृंगार....

साहित्य योग बनते मकान में चल रही है नंगे पैर सर पर पत्थर की टोकरी नाप रही दोपहरी की धूप बहता पसीना, सूखा जिस्ममन में द्रोपदी सी लज्जा आँखों में नमक का समुन्दर है ना कोई आस जिंदगी सेना कोई मंजिल....बनते मकान में बालों में सूखे... [पूरी पोस्ट]
writer Tej Pratap Singh
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[08 Mar 2010 19:20 PM]

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