मैं गर न टूटूं ....

काव्य मंजूषा तुम्हारी चोट सेमेरा दरकना लाज़मी तो नहीं,मगरकुछ बातें मेरे इख्तियार में भी नहींमुझे बार-बार तोड़ना, फिर जोड़नाप्रिय शगल है तुम्हारास्वामित्व का बोध कराता हैतुम सिर्फ मेरी होपुख्ता  अहसास दिलाता है  मैं तुम्हें खुश होने देती हूँइस लिए नहीं कि मैं... [पूरी पोस्ट]
writer 'अदा'

हम और तुम ....

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[08 Mar 2010 18:40 PM]

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