गीतिका: भुज पाशों में कसता क्या है? --संजीव 'सलिल
गीतिकासंजीव 'सलिल'भुज पाशों में कसता क्या है?अंतर्मन में बसता क्या है?जितना चाहा फेंक निकालूँउतना भीतर धँसता क्या है?ऊपर से तो ठीक-ठाक हैभीतर-भीतर रिसता क्या है?दिल ही दिल में रो लेता है.फिर होठों से हँसता क्या है?दाने हुए नसीब न जिनकोउनके घर में पिसता...
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आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
samyik hindi kavita
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[08 Mar 2010 08:22 AM]



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