“संगीता स्वरूप का बालगीतः रेल” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”
“छुक-छुक करती आई रेल!”छुक-छुक करती आई रेल!आओ मिलकर खेलें खेल!! लालू-ममता जल्दी आओ! आकर के डिब्बा बन जाओ!! खूब चलेगी अपनी रेल! आओ मिलकर खेलें खेल!! गुड्डी आई पिंकी आई! लाल हरी झण्डी ले आई!! लगी रेंगने अपनी रेल! आओ मिलकर खेलें खेल!! इंजन चलता आगे-आगे!...
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डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
बालगीत
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[24 Feb 2010 04:42 AM]



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