‘‘पतंग का खेल’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
लाल और काले रंग वाली, मेरी पतंग बड़ी मतवाली।मैं जब विद्यालय से आता,खाना खा झट छत पर जाता। पतंग उड़ाना मुझको भाता, बड़े चाव से पेंच लड़ाता।पापा-मम्मी मुझे रोकते,बात-बात पर मुझे टोकते।लेकिन मैं था नही मानता,इसका नही परिणाम जानता।वही हुआ...
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डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
बालकविता
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[08 Mar 2010 06:06 AM]



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