मेरी पहली कविता

मेरी कही मैं शून्य में देखता हुआ...निर्विकार, निरंतर..कभी हाथों की लकीरों को...अपने मस्तिष्क पटल पर...इन्हें इधर से उधर खींचता हुआ...ये यहां से वहां चली जाये...तो सुनहरा भविष्य दिखे...लकीरें बेहद गहरी हैं...न इधर जाती हैं न उधर...वर्षों से हाथों पर जमी हैं...जैसे... [पूरी पोस्ट]
writer अखिलेश शर्मा

पहली कविता

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[15 Feb 2010 02:38 AM]

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