मन न रंगाए, रंगाए जोगी कपड़ा!
अरविंद चतुर्वेदसृष्टि की सर्वोत्तम रचना होकर भी पुरूष रंगों के मामले में प्रकृति से कई हाथ पीछे है। प्रकृति हमसे कहीं ज्यादा रंगीन है। उसके खजाने में रंग ही रंग हैं। आदमी ने रंगों के आचरण का पहला पाठ भी प्रकृति से ही पढ़ा होगा। यानी रंगों की पाठशाला में...
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अरविन्द चतुर्वेद
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[28 Feb 2010 08:54 AM]



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