साये
साये पहले साये चलते थे अब बोलने लगे,मेरी हंसी दुनियाँ में ज़हर घोलने लगेजब रात गहरायी आंखें बंद होने लगी,तो सपनों में डरावने मंज़र दौड़ने लगेजैसे कोई तहक़ीकात कर रहा हो मेरी,सारे गुनाहों ...
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SURINDER RATTI
दर्पण के पन्नो से
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[07 Mar 2010 10:43 AM]



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