शुरूआत
जीवन से ऊबकर व्यवस्था से निराश चट्टान के कगर पर खड़ा सामने वितत-विशाल-औंडा-ताल पूछा स्वयं से,”सोच ले फिर से, क्या मरना ज़रूरी है?” ”हाँ,” -दू टूक-सा दिया मैंने उत्तर और कूद पड़ा झट से; तीखी थी छलाँग, ताल ने भी नहीं मचाया शोर ना ही कहीं उठी हिलोर व्यवस्था...
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Amitraghat
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[11 Feb 2010 07:54 AM]



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