शलाम शाब
धुँधलके को तोडती हुई वह आवाज़ ”शलाम शाब” ”दीवाली का इनाम शाब” और सस्मित आ खड़ा हुआ फिर सलाम ठोकता मालदार महाशयों के बीच जी रहा हज़ारों किमी दूर थानकों से अभिनिष्क्रमित तथागत की जन्म स्थली का वह वामन युवा चुपचाप देखता कई दिनों का रखा उपयोगितावादी पड़ोस का...
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Amitraghat
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[12 Feb 2010 09:13 AM]



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