वैश्विक गिरोह्

amitraghat वैश्विक होते संसार में हर ओर अतृप्त इच्छा-लालसा-कुंठाओं की जलती लाशों से उठती लपलपाती झंझार से भागता हूँ विशून्य में थकहार ढूँढ़ता हूँ पेशल रात को उसकी अंकोर में सिर रख सो जाना चाहता हूँ उमगती भोर तक; कि तभी ठकमुर्री से देखता हूँ दिगंत-व्याप्त-रात की... [पूरी पोस्ट]
writer Amitraghat
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[22 Feb 2010 09:06 AM]

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