आलम-ए-इश्क (ग़ज़ल)

काव्य तरंग तुमसे मिली है नज़रे जब से, मैं तो दिवानी हो गईबस इक तुम हो अब अपनों में,सारी दुनिया बेगानी हो गईइश्क में जो आहें भरते है, हम अक्सर उन पर हसते थेतेरे इश्क में अपनी भी, उनके ही जैसी कहानी हो गईबिन तेरे हर इक मंज़र मुझको, सूना सूना लगता हैतनहाई और बेचैनी ही,... [पूरी पोस्ट]
writer RaniVishal

काव्य तरंग

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[15 Feb 2010 18:24 PM]

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