ना आए विरह की रैन
दो नयना मिल दो से चार हुए, ना सूझे कोई औरजो तुम सुध आकर लो मेरी, मैं यह दुनिया दू छोड़ धरती मचले प्यास से, बादल का ना कोई निशानचंचल मन हुआ बावरा, तुम बिन देह हुई निष्प्राण कोयल कूहके बाग में, पपीहे ने मचाया शोरऋतु पर भी यौवन चड़ा, पर ना नाचे मन का मोर...
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RaniVishal
काव्य तरंग
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[19 Feb 2010 20:59 PM]



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