आज भी बचपन भूखा नंगा .....चाय की प्यालियाँ धोता है !!
नन्हे हाथ मजदूरी करतेशिक्षा को मोहताज फिरेकूड़े में चुनते रोज़ी अपनीनुक्कड़ पर भिक्षा माँग रहे...दो जून के दाने मिलते नहीं, हड्डियों का चुरा भी करने पर तन ढाकने को कपड़े नहीं, सर छुपाने को नहीं है घर !!आज भी बचपन भूखा नंगाचाय की प्यालियाँ धोता है !!स्टेशन पर...
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RaniVishal
कविता
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[07 Mar 2010 22:57 PM]



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