जनाब सरवर की एक ग़ज़ल : ग़ज़ल 11
ग़ज़ल 11 दिल पे गुज़री है जो बता ही दे ! दास्ताँ अब उसे सुना ही दे ! मेरे हक़ में दुआ नहीं, न सही किसी हीले से बददुआ ही दे ! खो न जाए कहीं मिरी पहचान तू वफ़ा का सिला जफ़ा ही दे ! शामे-फ़ुरक़त की तब सहर होगी हुस्न जब इश्क़ की गवाही दे बे-ज़बानी मिरी जुबाँ है अब...
[पूरी पोस्ट]
आनन्द पाठक
6
0
0
0
0
[13 Feb 2010 09:34 AM]



Shuffle








