आखिर क्या करूँ मैं...
शाम ढल चुकीरात गहरा रही हैचारों तरफ अँधेरा ही अँधेरा हैराह नजर नहीं आ रही हैइन्तजार करूं रात ढलने कानयी सुबह आने काया फिर चलता रहूँअँधेरे में हीपर कहीं इस अँधेरे मेंठोकर खा कर गिर पड़ा तोकहीं अँधेरे में गलत राह पर निकल पड़ा तोफिर मंजिल और दूर हो...
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अभिषेक प्रसाद 'अवि'
हिन्दी
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[08 Mar 2010 03:35 AM]



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