परम्पराओं का बोझ ढोते हम

भारत दुर्दशा स्वतंत्र समाजों में परम्पराएं अनुभवों से उद्भूत होती हैं किन्तु लम्बे समय तक गुलाम रहे देशों में परम्पराएं कृत्रिम रूप से भी थोपी जा सकती हैं. भारत में ऐसा बहुत अधिक हुआ है. परम्पराएं कुछ सीमा तक बुद्धि उपयोग को अवरोधित करती हैं, और प्रायः हम उन्ही बातों... [पूरी पोस्ट]
writer देवसूफी राम कु० बंसल

भारतीय समाज

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[16 Feb 2010 18:06 PM]

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