धड़कने जब धडकनों से बोलती है
धड़कने जब धडकनों से बोलती है...जाने कितने राज़ दिल के खोलती है,थाम लेती हैं हथेली दूर से ही...बाँहों में बाहें फसा कर डोलती हैं.कितने भी कड़वे हो लम्हे जिंदगी के...तल्खियों में चाशनी सी घोलती हैं,बेपनाह चाहतों की बारिशों को...जब बहाती है कभी न तोलती है....
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ranjana
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[12 Feb 2010 07:45 AM]



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