दुःख
मन चिटका और बह निकला दुःखसात समुन्दर पार कहींआशाएं भी टूटी बिखरीआँखे भी भरपूर बहीक्यों मन भारी, क्यों मैं हारीप्रश्न न जाने कितने हैचहरे के पीछे चेहरे हैंसब नकली है जितने हैंबढती जाती मन की पीड़ागहरे होते जाते घावसच हर रोज अपाहिज होताझूठ के लम्बे होते पाँव...
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ranjana
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[24 Feb 2010 14:50 PM]



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