A poetess blog
बड़े दिनों से न जानेकितना कुछ मन में छुपा हुआ थाथा कोई तूफ़ानन जाने कैसे अबतक रुका हुआ थाएक बहुत मज़बूत इमारतधीरे धीरे दरक रही थीआज मोम बन पिघल रही थीमन में जो भी कसक रही थीगहराई की सारी सीमाभरते भरते आज भरी थीमै जितनी मासूम थी दिल सेदुनिया उतनी सख्त कड़ी...
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ranjana
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[24 Feb 2010 14:57 PM]



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