हम फिर से नए रविवार के सत्यानाश होने की बाट जोह रहे है , क्यों की उपरवाले का कुफ्र है टूटेगा जरूर !
शाशिभूषणतामड़े उवाच;दोस्तों,अब तो जैसे रविवार का दिन ज्यू ज्यू नजदीक खिसकता आता दिखता है वैसे वैसे दिल बैठने सा लगता है , कहने को दिन तो ये छूटी के लिए मुकरर है मगर मशरूफियत असल में अपने उफान पर होती है , हप्ते भर बांकी दिनों की डेली रूटीन किसी भी सूरत...
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S B Tamare
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[25 Feb 2010 13:45 PM]



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