टुन्न होकर गरियाने का पर्व
व्यंग्य-प्रमोद ताम्बटलो फिर चन्दा खाने का त्यौहार आ गया।जी हाँ, होली को हमने हमेशा सामूहिक रूप से चन्दा खाने के त्यौहार के रूप में ही देखा है। बचपन में मोहल्ले के सारे चन्दा खाऊ इकट्ठा होकर घर-घर जाकर खाने लायक चन्दा इकट्ठा करते और फिर बाकायदा बजट बनाकर...
[पूरी पोस्ट]
प्रमोद ताम्बट
व्यंग्य
4
0
0
0
0
[27 Feb 2010 22:36 PM]



Shuffle








