अकुलाहट
आकुल से मन की व्याकुल सी भाषा है छंद लिखूं कोई तो वो भी तो आधा है प्रखर है सोच, पर वेग ज़रा ज्यादा है बह जाता आवेश लिखने में बाधा है अवरुद्ध हुए भाव बस स्वार्थ ही साधा है संतुष्टि मिले कहाँ मन पर बोझ ही लादा है .आकुल से मन की व्याकुल सी भाषा है बह जाता...
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sangeeta swarup
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[10 Feb 2010 13:04 PM]



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