फिर कैसे मल्लहार सुनाऊं
अंसुअन की स्याही सूख गयी मैं कलम कहाँ डुबाऊंअपनी मन की व्यथा कथा मैं किन शब्दों में कह जाऊंप्रतिपल घटता जीवन जैसे कैसे मैं ठांव लगाऊंचलता जीवन बहता दरिया , कैसे मैं बाँध बनाऊंसोच भंवर के चलते जाते कैसे मैं पार हो पाऊंतेज़ है धारा कश्ती उलटी ,कैसे पतवार...
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sangeeta swarup
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[12 Feb 2010 08:50 AM]



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