टुकड़े टुकड़े ख्वाब

गीत............... गर्भ -गृह से आँखों की खिड़की खोल पलकों की ओट से मेरे ख़्वाबों ने धीरे से बाहर झाँका कोहरे की गहन चादर से सब कुछ ढका हुआ था .धीरे धीरे हकीक़त के ताप ने कम कर दी गहनता कोहरे की और ख़्वाबों ने डर के मारे बंद कर लीं अपनी आँखे .क्यों कि -उन्हें दिखाई दे गयीं थी... [पूरी पोस्ट]
writer sangeeta swarup
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[22 Feb 2010 08:27 AM]

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