आखिर बुरा क्या है ?
मन के दरख्त पर जमा ली हैं ख्वाहिशों ने अपनी जड़ें और जा रही हैं फलती फूलती अमर बेल की तरह उत्तरोत्तर .रसविहीन दरख्त मौन है बना हुआ पंगु सा जब होगा एहसास हकीकत का तो हो जाएँगी सारी बेलें धूल धूसरित .मन ने सोचा किख्वाहिशों की ख्वाहिश पलने दो अंत में तो...
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sangeeta swarup
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[02 Mar 2010 07:45 AM]



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